रविवार, 19 दिसंबर 2021

Artificial Intelligence... क्या इंसानों की जगह ले लेंगे रोबोट्स?


मशीनों ने पहले इंसान की जिंदगी बदली और अब नया दौर आने वाला है दुनिया में स्मार्ट मशीनों का... यानी जब मशीन खुद से सोच-समझ सकेंगे और खुद से फैसले ले सकेंगे. ये कैसे संभव होगा इसे अभी दुनिया कौतूहल के साथ देख रही है लेकिन तकनीक की दिग्गज कंपनियां इसे सच कर दिखाने के बहुत करीब हैं. इसे नाम दिया गया है- Artificial Intelligence. आज हर कोई जानना चाहता है कि आखिर ये है क्या?

साल 1955 में अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक जॉन मेकार्थी ने इस तकनीक की पहचान की थी. इसका सीधा मतलब था उस तकनीक से जिससे मशीनों को स्मार्ट बनाया जा सके. ये दो शब्दों आर्टिफिशियल और इंटेलिजेंस से मिलकर बनी है. यानी इंसान द्वारा निर्मित सोच की शक्ति. इस तकनीक की मदद से ऐसा सिस्टम तैयार किया जा सकता है, जो इंसानी बुद्धिमत्ता यानी इंटेलिजेंस के बराबर होगा. यह तकनीक खुद सोचने, समझने और कार्य करने में सक्षम है.

नए उभरते रोबोट्स के रहस्य और तकनीक के तमाम विकास के बावजूद अब तक दुनिया में मशीन और इंसान के बीच एक बड़ा फर्क है, वो है सोचने-समझने की क्षमता और लॉजिक के आधार पर फैसले कर काम करने को लेकर... लेकिन आपको हैरानी होगी कि आने वाली दुनिया में ये हालात बदलने वाली है. यानी मशीन भी खुद से सोच-समझ कर लॉजिक के आधार पर फैसले कर पाएंगे और इससे मेडिकल-एजुकेशन, रिसर्च समेत तमाम क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव आने वाले हैं. इस तकनीक को आने वाले कल की दुनिया की तस्वीर बताई जा रही है.

इंसानों की तरह क्षमताएं

कुछ हद तक दुनिया में ये लंबे समय से चली आ रही है सुपर कंप्यूटर के रूप में,  लेकिन अब सुपर स्मार्ट मशीनों का दौर आने वाला है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पिछले समय का डेटा स्टोर कर, उनका इस्तेमाल कर खुद सीखने और फैसला लेने में सक्षम है. इसकी क्षमता मानव मस्तिष्क की सीमा तक पहुंच गई है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रणाली के आने से रोबोट्स इंसानों की तरह यह जान सकेंगे कि उनका वजूद क्या है. इसके बाद इंसानों और मशीनों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक आने से मेडिकल सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा होगा. इस तकनीक से एक्सरे रीडिंग आसान हो जाएगी. डॉक्टर्स को अनुसंधान में मदद मिलेगी. साथ ही मरीजों का बेहतर तरीके से इलाज भी किया जा सकेगा. खासकर रिमोर्ट डायग्नोसिस और रिमोट सर्जरी के जरिए. इसके अलावा खेल, स्कूल-कॉलेज से लेकर कृषि के क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी इससे बहुत फायदा होगा. तकनीक के जरिए ट्रेनिंग और नई जानकारियों को तुरंत लोगों को समझाने में आसानी होगी.

हालांकि, कुछ लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने के खतरे भी गिनाने लगे हैं. लोगों का मानना है कि स्मार्ट मशीनों के आने से कई काम मशीन कर सकेंगे. इससे बेरोजगारी बढ़ेगी. इसके अलावा जैसा कि हॉलीवुड फिल्मों में दिखाया जाता है वैसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने से मानव जाति को भी खतरा हो सकता है. क्योंकि रोबोट्स इस तकनीक के जरिए अपने आप को विकसीत कर खुद खतरनाक हथियार बना सकते हैं. हालांकि इतने दूर के भविष्य के खतरे को लेकर अभी कोई ठोस आधार नहीं है और इसीलिए लोग अभी इसे कौतूहल भरी नजरों से देख रहे हैं.

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

तकनीक पर इंसान की निर्भरता पर एक इंटरेस्टिंग फैक्ट...


आपको जानकर हैरानी होगी कि जहां दुनिया की आबादी 8 अरब के करीब है वहीं दुनिया में इस्तेमाल हो रहे कुल मोबाइल फोन की संख्या 15 अरब है. यानी दोगुने के करीब...पहले इंसान मशीनों से मदद लेता था लेकिन अब हर आदत मशीनों के अनुसार हो गया है. एक छोटा सा मोबाइल आज के इंसान के लिए क्या-क्या नहीं है... अलार्म, घड़ी, टीवी, रेडियो, बैंक, घर पर मौजूद बाजार, निवेश, ऑनलाइन पढ़ाई का माध्यम, गेम, मनोरंजन के लिए सिनेमा, गानों और खेल का अड्डा... लेकिन इसके खतरे भी कई हैं... आज ये जहां हर काम में मददगार है वहीं इंसान की दुनिया इसी छोटे से मोबाइल में कैद होकर भी रह गई है... दुनिया का सबसे महंगा मोबाइल फोन The Goldphone by Caviar को माना जाता है. सोने से बने इस मोबाइल की कीमत 1,26,56,000 रुपये है. 

रविवार, 28 नवंबर 2021

नीदरलैंड के बच्चे दुनिया में सबसे खुशहाल क्यों हैं? भारतीय मां-बाप से अलग वहां क्या है?


आज सुबह-सुबह अखबारों को खंगाल रहा था तभी पड़ोस के मकान से एक महिला की आवाज आई- हरामजादे स्कूल के काम कब करेगा? जाहिर है ये किसी मां की आवाज थी जो अपने बच्चे की बेहतरी को लेकर चिंतित थी लेकिन तरीका वहीं अपना ठेठ देसी भारतीय. इससे पहले कि उस महिला की आलोचना मन में आती, कल की अपनी गलती याद आ गई. ठीक ऐसे ही तो डांटा था मैंने भी अपने 9 साल के बच्चे को. जो अपनी पढ़ाई में हर समय अव्वल रहता है बस हमारी पुरानी सोच के अनुरूप किताबी कीड़ा बनने से बचता रहता है.


गूगल में सर्च करने लगा कि क्या दुनिया के बाकी देशों में भी मां-बाप बच्चों को ऐसे ही हैंडल करते हैं तो हाथ लगी  UNICEF की साल 2020 की एक रिपोर्ट. जिसके अनुसार यूरोपीय देश नीदरलैंड के बच्चों को सबसे खुशहाल के रूप में आंका गया है. मन में सवाल उठा कि आखिर वहां के मां-बाप के वे कौन से तरीके हैं या स्कूली सिस्टम में ऐसा क्या फर्क है कि हमारी मार-पिटाई, डांट-फटकार वाले सिस्टम से अलग जिंदगी वहां के बच्चे जी रहे हैं और ज्यादा खुशहाल हैं, बल्कि यूं कहें कि ज्यादा सफल भी हैं.


बच्चों की ये रैंकिंग 41 अमीर देशों की स्टडी के आधार पर तैयार की गई. इसका पैमाना एकेडमिक और सोशल स्किल थी. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य समेत वे सारे पैमाने भी थे जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के लिए जरूरी हैं. नीदरलैंड के बाद डेनमार्क और नॉर्वे इस लिस्ट में दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं. 41 देशों की इस लिस्ट में सबसे नीचे मिले चिली, बुल्गारिया और अमेरिका. नीदरलैंड आर्थिक रूप से मजबूत देश है, सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी वहां सरकारें काफी जिम्मेदारियां उठाती हैं, लेकिन इसका  मतलब ये भी नहीं है कि सिर्फ पैसे से खुशहाली आती है. सिर्फ पैसे से बच्चों की खुशहाली तय होती तो अमेरिका इतना पीछे नहीं होता.


एक्सपर्ट इसका सीक्रेट बताते हैं... बच्चों के लिए स्पष्ट लिमिट यानी सीमाएं तय करें, प्रेम और संबंधों में वार्म्थ, कुछ अच्छा करने का मोटिवेशन, साथ ही उन्हें अपने भविष्य का रास्ता चुनने की आजादी दें. यही कुछ सीक्रेट्स हैं जो बच्चों की खुशहाली का रास्ता साफ करते हैं. बच्चों से खुलकर बात करें कि वे क्या करना चाहते हैं, क्या कमियां हैं, कैसे उन्हें दूर किया जा सकता है. डच लोग यानी नीदरलैंड के लोग अपने बच्चों से उन मुद्दों पर भी खुलकर बात करते हैं जिनपर एशियाई समाजों में बच्चों और पैरेंट्स के बीच एक दीवार जैसी खड़ी कर दी गई है.


इसके अलावा भी कई ऐसे फैक्टर हैं जो तय करते हैं कि बच्चों की जिंदगी खुशहाली भरी होगी या नहीं? जैसे- बच्चों पर कितना एकेडमिक बोझ है, कहीं सोशल मीडिया के प्रभाव में दूसरों के पोस्ट देखकर आप भ्रमित होकर बच्चों पर दबाव तो नहीं बना रहे हैं क्योंकि जरूरी नहीं कि सोशल मीडिया पोस्ट में लोग जितने चमकते दिख रहे हों वो सच ही हो. सोशल मीडिया के दौर में मां-बाप के लिए जरूरी है कि वे वास्तविकता की धरातल को पहचानें. बेवजह बच्चों पर दबाव न बनाएं. बच्चों को इस बात की आजादी मिले कि वो जो बनना चाहते हैं उन्हें उस दिशा में काम करने की आजादी मिले. वे सकारात्मक माहौल के लिए अपने सही दोस्त चुन सकें. उन्हें हर बात पर जज न किया जाए. खेल-कूद की भी उन्हें आजादी मिले.


नीदरलैंड स्कूलों में गलाकाट प्रतियोगिता के माहौल की जगह स्किल लर्निंग के माहौल पर जोर देने वाला देश है. मां-बाप के लिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि स्कूल के स्कोर कोई आखिरी पैमाना नहीं हो सकते हैं बच्चों को आंकने के लिए. इसकी बजाय बच्चों में लर्निंग और जिज्ञासा के माहौल को बढ़ाने पर जोर दें. इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर नॉर्वे है. नॉर्वे अपने स्कूलों में टूगैदरनेस को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है. मतलब अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रगति में मदद करने की आदत. इसके लिए परिवारों का सामुदायिक बेहतरी के कामों में योगदान देने को वहां के समाज में काफी सराहा जाता है.


हमारे एशियाई समाज इसीलिए टूटते चले गए कि हमनें न तो परिवारों को संभालने पर ध्यान दिया और न ही समाज में अच्छी आदतों, अच्छे काम और अच्छी पहल को सराहने की पहल की. और जो काम हम नहीं करते वो बच्चे कैसे सीखेंगे. हम जो गलतियां खुद करते हैं उन्हें बच्चों को नहीं करने को कहते हैं... आखिर ये कैसे संभव है कि हम कर रहे हैं और बच्चों को रोक पाएं. इसलिए सबसे जरूरी है खुद में बदलाव लाएं और फिर अच्छे बदलावों को बच्चों को समझाएं.

शनिवार, 20 नवंबर 2021

प्रदूषण से निपटना इतना मुश्किल तो नहीं, अगर सरकारों की इच्छाशक्ति हो तो?

किसी शायर ने आज के हालात को देखते हुए ही शायद लिखा था-

'सांस लेता हूं तो दम घुटता है,

कैसी बे-दर्द हवा है यारो...'




कभी महान साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि दुनिया के संसाधनों का इंसान इतना ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है कि 100 साल बाद ये धरती रहने लायक नहीं रह जाएगी और इंसान को किसी और ग्रह पर जाकर रहना होगा. आज भविष्य के इस संकट की झलक दिल्ली जैसे बड़े शहरों में एयर पॉल्यूशन यानी प्रदूषण के रूप में दिखने भी लगी है.


लेकिन दूसरे देशों में उठाए जा रहे कदमों को देखकर आप भी अंदाजा लगा सकते हैं कि आपके मुल्क में समस्याओं को हल करने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं वो क्यों सफल नहीं होते?


साल 2019 में बैंकॉक शहर में प्रदूषण के हालात एकदम गंभीर अवस्था में आ गए थे. ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों पर रोक लगाई गई, बच्चों को सेफ रखने के लिए स्कूलों को बंद किया गया, फैक्ट्रियों और अन्य उद्योग धंधों में प्रदूषण की निगरानी के लिए पुलिस और सेना को तैनात कर सख्ती की गई.


कई इनोवेटिव कदम उठाए गए. प्लेन के जरिए क्लाउस सीडिंग कर कृत्रिम बरसात कराई गई और आसमान से प्रदूषण को साफ किया गया. सड़कों पर चल रहे टू-थ्री व्हीलर्स गाड़ियों को गैसोलीन की बजाय इलेक्ट्रिक गाड़ियों में बदलने के लिए कदम उठाए गए. शहर में गाड़ियां कम करने के लिए कैनल ट्रांसपोर्ट सिस्टम शुरू किया गया ताकि नहरों में नाव और फेरी चलाकर ट्रांसपोर्ट के नए विकल्प दिए जा सकें.


आज दो साल बाद वहां PM2.5 AQI लेवल 50-82 के बीच बना हुआ है. जबकि WHO के स्टैंडर्ड के अनुसार 100 से अधिक का AQI बीमार लोगों और बुजुर्गों के लिए संकट का कारण बन सकता है. इसी तरह चीन ने कार्बन डाई-ऑक्साइड सोंखने और ऑक्सीजन जेनरेशन के लिए वर्टिकल जंगल लगाए, स्मॉग टॉवर बनाए.

सोमवार, 20 सितंबर 2021

दुनिया चली अंतरिक्ष की ओर...मिल गया सैर-सपाटे का नया अड्डा!

 ये हफ्ता धरती पर रह रहे इंसानों के लिए अद्भुत साबित हुआ. वैसे तो इसका अनुभव दुनिया के सिर्फ चार लोगों ने लिया लेकिन उम्मीदें सबकी जगा गए. पहली बार चार लोग अंतरिक्ष टूरिज्म करके आ भी गए.



धरती पर इंसान जलवायु परिवर्तन, कोरोना वायरस महामारी समेत तमाम समस्याओं से जूझ रहा है तो क्या इंसान अब नया ठिकाना ढूंढ रहा है? इस हफ्ते इस दिशा में पहली कामयाबी इंसान ने हासिल की है. अमेरिकी बिजनेसमैन एलन मस्क की कंपनी SpaceX का पहला ऑल-सिविलियन क्रू अंतरिक्ष की सैर कर धरती पर लौट आया है. इसमें चार आम लोगों को स्पेस एक्स कैप्सूल से अंतरिक्ष भेजा गया था. इन लोगों ने तीन दिन अंतरिक्ष में गुजारे और फिर सुरक्षित वापस लौट आए.


चार यात्रियों में 38 साल के जेयर्ड आईजैकमैन, 51 साल के सियान प्रॉक्टर, 29 साल की महिला हेइली एक्रेनेऑक्स और 42 साल के क्रिस सेम्ब्रोस्की शामिल थे. इस यात्रा पर 200 मिलियन डॉलर का खर्च आया. पूरा खर्च इन चारों में शामिल जेयर्ड आईजैकमैन ने उठाया. आईजैकमैन ई-कॉमर्स कंपनी शिफ्ट 4 पेमेंट्स के सीईओ हैं. इंस्पिरेशन 4 के क्रू मेंबर्स का इस अंतरिक्ष यान को उड़ाने में कोई रोल नहीं था. इसे जमीन से ही ऑपरेट किया गया था. हालांकि, आईजैकमैन और प्रॉक्टर दोनों ही पायलट हैं.


चार लोगों की इस यात्रा ने स्पेस टूरिज्म के रास्ते खोल दिए हैं. अगर आपके पास पैसे हैं और घूमने का रोमांचक शौक है तो आप कुल्लू-मनाली, स्विटजरलैंड से आगे अंतरिक्ष तक भी घूमने निकल सकते हैं.

रविवार, 20 जून 2021

लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है...

 ...सपना क्या है? नयन सेज पर,

सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों,
जागे कच्ची नींद जवानी,
गीली उमर बनाने वालों! डूबे बिना नहाने वालों!
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गई तो क्या है,
खुद ही हल हो गई समस्या,
आँसू गर नीलाम हुए तो,
समझो पूरी हुई तपस्या,
रूठे दिवस मनाने वालों!
फटी क़मीज़ सिलाने वालों!
कुछ दीपों के बुझ जाने से आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी।
जैसे रात उतार चाँदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों!
चाल बदलकर जाने वालों!
चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार कश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों!
लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
-गोपाल दास नीरज की कविता का एक हिस्सा...

रविवार, 13 जून 2021

उम्मीदों का दीया जल रहा है...


उम्मीदों का दीया जल रहा है...

आंधियों से लड़ रहा है...


ये पंक्तियां आज किसी एक इंसान के जीवन की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया के 8 अरब लोग कमोबेश इसी हालात से गुजर रहे हैं...पिछले 16 महीने ऐसे बीते हैं जैसे कैदखाने में बीते हों...जैसे जिंदगी में कोई उम्मीद ही न बची हो, जैसे सबकुछ ठहर सा गया हो... न इंसान अपने तरीके से जी सकता है, न अपने पसंद की जगहों पर जा सकता है, न पसंद की चीजें खा सकता है, न किसी से मिल सकता है...रिश्ते-नाते, जान-पहचान सब ठेंगे पर रखे जा चुके हैं...है न निराश होने वाली बात..लेकिन नहीं...रुकने का नाम नहीं है जिंदगी...न ठहरने का...बल्कि चलते रहने का नाम ही है जिंदगी...इन 16 महीनों ने काफी कुछ सिखाया भी हमें...जरा एक बार इन 16 महीनों की अपनी जिंदगी के पन्नों को पलटकर देखिए...


...कैसे अपनी छोटी सी दुनिया में खुश रहा जा सकता है, जीवन में किन अनावश्यक आदतों को छोड़ा जा सकता था, किन सीमित चीजों में ही बुलंदी के साथ जिया जा सकता है, शांत माहौल में अपने-आप से कैसे साक्षात्कार किया जा सकता है, सकारात्मक विचारों वाली और दुनिया को गढ़ने का इतिहास समेटें किताबें कैसे आपकी दोस्त हो सकती हैं, कैसे अपने आपको समाज-देश-दुनिया और इंसानी जीवन की वास्तविकताओं को समझने में खुद को बिजी किया जा सकता है..इन सब के कई पन्ने समेटे हैं ये 16 महीने...


एक बार इन पन्नों को पलटकर देखिए... आपके जीने के तरीकों में क्या बदलाव आए इन 16 महीनों में, कैसे हम एक मैनुअल इंसान से डिजिटल होते चले गए, कैसे हमने अपने जीवन के अधिकांश काम घर बैठे डिजिटली करने के उपाय खोज निकाले... साग-सब्जी की खरीद हो, बैंक के काम हों, दवाइयों से लेकर डॉक्टरों की सेवा लेने तक कैसे घर बैठे एक्सेस मिलने लगे... ये सब हमारी प्रगति भी तो हैं...


इतना आसान भी नहीं रहे ये संकट के महीने लेकिन मुश्किलों में ही नए रास्ते निकलते हैं..यही मानव इतिहास कहता है. तो रुकना नहीं है, थमना नहीं है...नए रास्तों को खोजना है, उनसे अपने आसपास सकारात्मक माहौल बनाना है. ये मुश्किल कब खत्म होंगी...पता नहीं लेकिन इनसे लड़ना तो हमें आ ही गया है.

सोमवार, 4 जनवरी 2021

...वो ऐप जिसपर भारत में कोरोना वैक्सीन के लिए आपको रजिस्ट्रेशन कराना होगा


Co-WIN App... भारत सरकार का आधिकारिक ऐप. देश के वे नागरिक जो हेल्थ वर्कर्स नहीं हैं वह वैक्सीन के लिए CoWIN ऐप पर सेल्फ-रजिस्टर कर सकते हैं, जिसके लिए उन्हें ये ऐप गूगल प्ले स्टोर या ऐपल ऐप स्टोर से डाउनलोड करना होगा. टीकाकरण को उपयोग के लिए लॉन्च किए जाने के बाद जो लोग ऐप पर पहले से पंजीकृत होंगे उन्हें जल्द से जल्द वैक्सीन मिल सकती है.


भारत में सरकार तीन चरणों में टीका लगवाएगी. पहले चरण में सभी फ्रंटलाइन हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स और दूसरे चरण में आपातकालीन सेवाओं से जुड़े लोगों को कोरोना का टीका लगेगा. राज्य सरकारें इन लोगों का डेटा इकट्ठा करने में लगी हैं. तीसरे चरण में उन लोगों को वैक्सीन लगाई जाएगी, जो गंभीर बीमारियों के शिकार हैं. इसके लिए, Co-Win ऐप के जरिए सेल्फ रजिस्ट्रेशन प्रोसेस की जरूरत होगी.


कोरोना वैक्सीन की ट्रैकिंग और रजिस्ट्रेशन सुनिश्चित करने के लिए, Co-Win ऐप को 5 मॉड्यूल में बांटा गया है, जिसमें पहला प्रशासनिक मॉड्यूल, दूसरा रजिस्ट्रेशन मॉड्यूल, तीसरा वैक्सीनेशन मॉड्यूल, चौथा लाभान्वित स्वीकृति मॉड्यूल और पांचवां रिपोर्ट मॉड्यूल है. जो लोग टीकाकरण करवाना चाहते हैं, उन्हें पंजीकरण मॉड्यूल के तहत विवरण देना होगा. वैक्सीनेशन मॉड्यूल में, उनके विवरणों को सत्यापित किया जाएगा और लाभान्वित स्वीकृति मॉड्यूल उनके टीकाकरण के बारे में उन्हें एक सर्टिफिकेट भेजेगा.


CoWIN ऐप: Vaccine के लिए कैसे करें रजिस्टर?

1. देश के नागरिक जो स्वास्थ्य वर्कर नहीं हैं, वे CoWin ऐप पर रजिस्ट्रेशन मॉड्यूल के माध्यम से वैक्सीन के लिए रजिस्टर कर सकेंगे. CoWin ऐप को गूगल प्ले स्टोर या ऐप स्टोर के जरिए डाउनलोड किया जा सकता है.


2. Co-WIN वेबसाइट पर सेल्फ रजिस्ट्रेशन के लिए 12 फोटो आइडेंटिटी डॉक्यूमेंट्स- Voter ID, Aadhar card, driving license, passport और Pension document में से किसी एक की जरूरत होगी.


3. ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के बाद रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक SMS आएगा. जिसमें अलॉटेड तारीख और वैक्सीनेशन का टाइम और जगह दी जाएगी.


रविवार, 3 जनवरी 2021

दो डोज जिंदगी की

नए साल के साथ ही भारत में कोरोना से उबरने की नई उम्मीदोंं ने भी जगह बना ली है. भारत दुनिया का अकेला देश बन गया है जिसने कोरोना की दो वैक्सीन्स को एक साथ मंजूरी दी है. ऑक्सफोर्ड-सीरम इंस्टीयूट की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को मंजूरी मिल चुकी है. लेकिन इसका टीकाकरण अभी सिर्फ सरकार ही करेगी. इसलिए किसी साइबर ठग गिरोह के भ्रमजाल में न फंसें. ये टीके अभी मेडिकल फील्ड से जुड़े लोगों और सुरक्षाबलों को ही दिया जाएगा.

शनिवार, 2 जनवरी 2021

New Year, New Hope @2021

साल बदल गया है, दशक बदल गया है और उम्मीदें भी...पिछला पूरा साल इस इंतजार में बीता है कि महामारी से कब निजात मिलेगी, कब दुनिया फिर पहले जैसी होगी. अब नए साल में नई उम्मीदें जगी हैं, दुनिया के फिर से पहले जैसे होने की, पहले जैसी चहल-पहल बाजारों में, मॉल्स मेंस सिनेमाघरों में, बाजारों में होने की. लेकिन इससे पहले चुनौतियां हैं टीकाकरण की. कोरोना वैक्सीन आने वाली है इस खबर ने उम्मीद जगाई है तो उससे पहले साइबर ठग लोगों को वैक्सीन के नाम पर ठगने की कोशिशों में भी जुट गए हैं. सतर्क रहें, सरकारी व्यवस्था के अनुसार चलें. क्योंकि ना तो हमें पता है कि वैक्सीन पर किसके दावे सही हैं किसके गलत, ईमेल-मैसेज-व्हाट्सऐप मैसेजेज में जो लिंक दिए जा रहे हैं वो ठगी के लिए है या सच में हैं. इसलिए इंतजार करें, कहीं भी क्लिक ना करें. सही सूचनाओं के अनुसार चलें. दुनिया बदलेगी, हालात बदलेंगे, फिर बेहतर होगा सबकुछ...

जंग कहां-कहां और कैसे कैसे असर डाल सकती है?

 समयकाल... साल 1941-1942 यूरोप में दूसरे महायुद्ध के छिड़े करीब दो साल हो गए थे. ब्रिटिश शासन में होने के बावजूद शुरू के दो साल भारत या दिल्...